शहीद वंदन
कुछ शेर लिखा कुछ ग़ज़ल लिखा कुछ लिखा गीत श्रृंगारों पर
आओ अब वंदन लाया हूँ भारत के पहरेदारों पर
भारत की बलिवेदी पर अपने प्राण जिन्होंने गँवा दिया
उनके सम्मुख पवित्र तिरंगे ने भी शीश नवा दिया
वो तो सच्चे परवाने थे ये देश बना फिर दिया था
वो महादेव बन आये थे जो उठा ज़हर को पिया था
लहू नहीं था गंगाजल था रक्त गिरा जो धरती पर
देवों से भी पूज्यनीय था सख़्श गिरा जो धरती पर
स्वर्णिम वर्दी को बहकर खूनों ने छिट पुट रंगा था
मानो बदन से लिपटा वो वर्दी नहीं तिरंगा था
आँखों में वो चमक थी जैसे ख़त्म अभी संग्राम करूँ
अभी लालसा बाकी जैसे एक और बलिदान करूँ
भारत अब उनका पिता हुआ भारत अब उनकी मइया थी
बन भीष्म पितामह डटे रहे बलिवेदी अब सरसैय्या थी
गिरिराज साक्षी थे तब, जब वीरों ने दुश्मन रौंदा था
क्या बर्फ़ पहाड़ी और शीतलहर उनका यही घरौंदा था
माँ बेटी पत्नी सब भूले मातृभूमि बस याद रही
तू जन्मा है तू पालेगा ईश्वर से ये फ़रियाद रही
***
ताबूतों में रख कर के सर कटी लाश घर आई है
क्या खेत शिवाले और पोखरी सब ओर उदासी छाई है
विधवा रोती बच्चे रोते अब रोती बूढ़ी माता है
पगलाई सी बहना रोती अब रोती भारत माता है
विधवा खुद रोती है पर बच्चों को समझाती है
बेटा पापा कल आएंगे ये तो उनका इक साथी है
जब उस बेचारी ने मांग से सिन्दूरों को धोया होगा
भगवान जहाँ कहीं भी हो आख़िर तू भी रोया होगा
***
रंग केसरी और बढ़ा उस विधवा के सिन्दूर से
वो खून जो धरती सोखी थी उस भारत माँ के नूर से
धवल रंग बूढ़ी माँ के पकते बालों की छाया है
बापू की उजली धोती के इक कोने से ये आया है
हरा रंग तो वो चुनरी है जो विधवा ने अब छोड़ दी
या उन कंगन चूड़ी की रंगत जो उसने अब तोड़ दी
***
देवों की श्रेणी में रखकर इनका हम वंदन करते हैं
इन अमर शहीदों का हम शत शत अभिनन्दन करते हैं
जय शहीद जय हिंद तिरंगे की करते हम आरती
आओ हम सब मिलकर बोलें जय जय माता भारती
- सौरभ श्रीवास्तव
आओ अब वंदन लाया हूँ भारत के पहरेदारों पर
भारत की बलिवेदी पर अपने प्राण जिन्होंने गँवा दिया
उनके सम्मुख पवित्र तिरंगे ने भी शीश नवा दिया
वो तो सच्चे परवाने थे ये देश बना फिर दिया था
वो महादेव बन आये थे जो उठा ज़हर को पिया था
लहू नहीं था गंगाजल था रक्त गिरा जो धरती पर
देवों से भी पूज्यनीय था सख़्श गिरा जो धरती पर
स्वर्णिम वर्दी को बहकर खूनों ने छिट पुट रंगा था
मानो बदन से लिपटा वो वर्दी नहीं तिरंगा था
आँखों में वो चमक थी जैसे ख़त्म अभी संग्राम करूँ
अभी लालसा बाकी जैसे एक और बलिदान करूँ
भारत अब उनका पिता हुआ भारत अब उनकी मइया थी
बन भीष्म पितामह डटे रहे बलिवेदी अब सरसैय्या थी
गिरिराज साक्षी थे तब, जब वीरों ने दुश्मन रौंदा था
क्या बर्फ़ पहाड़ी और शीतलहर उनका यही घरौंदा था
माँ बेटी पत्नी सब भूले मातृभूमि बस याद रही
तू जन्मा है तू पालेगा ईश्वर से ये फ़रियाद रही
***
ताबूतों में रख कर के सर कटी लाश घर आई है
क्या खेत शिवाले और पोखरी सब ओर उदासी छाई है
विधवा रोती बच्चे रोते अब रोती बूढ़ी माता है
पगलाई सी बहना रोती अब रोती भारत माता है
विधवा खुद रोती है पर बच्चों को समझाती है
बेटा पापा कल आएंगे ये तो उनका इक साथी है
जब उस बेचारी ने मांग से सिन्दूरों को धोया होगा
भगवान जहाँ कहीं भी हो आख़िर तू भी रोया होगा
***
रंग केसरी और बढ़ा उस विधवा के सिन्दूर से
वो खून जो धरती सोखी थी उस भारत माँ के नूर से
धवल रंग बूढ़ी माँ के पकते बालों की छाया है
बापू की उजली धोती के इक कोने से ये आया है
हरा रंग तो वो चुनरी है जो विधवा ने अब छोड़ दी
या उन कंगन चूड़ी की रंगत जो उसने अब तोड़ दी
***
देवों की श्रेणी में रखकर इनका हम वंदन करते हैं
इन अमर शहीदों का हम शत शत अभिनन्दन करते हैं
जय शहीद जय हिंद तिरंगे की करते हम आरती
आओ हम सब मिलकर बोलें जय जय माता भारती
- सौरभ श्रीवास्तव
सच कहा गया है चिंगारी आग लगाने के लिए काफी होती है ठीक वैसे ही आपकी कविता में भी एक आग लगाने की शक्ति है।।good job...
ReplyDeleteअरे शुक्रिया भाई साहब
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