ख़ुदा की शेर के रदीफ़

बस अचानक ही आज उस प्रोफ़ाइल की DP में दो आँखें दिख गयीं। दरअसल मैं उन्हें फ़ॉलो तो करता हूँ मगर वो अपनी कोई ज़ाहिर सी तस्वीर timeline पर नही लगाये हैं। या यूँ कह लो कि चाँद के सभी करतबों को तो देखा है बस चौदहवीं के चाँद को नहीं देखा। बहुत मन हुआ की पूरी तस्वीर देखी जाए,  तकाज़ा भी किया गया उनसे...पर वो चाँद भी क्या जो तक़ाज़े पर ईद कर दे। अब ईद के लिए तो पूरा रोज़ा रखना ही पड़ेगा न। उन आंखों में कोई खंजर वंजर नही था...ना ही किसी हिरनी की आंखों का अंदेशा होता था और ना ही वो किसी झील जैसी बहुत गहरी थीं...उन आँखों में सच्चाई थी, एक सादगी थी, एक भोलापन था...वो आँखें जो बहुत कुछ कह रही थीं मगर ख़ामोश थीं...इतनी बेबाक़ आँखें थीं कि उसमें सियाह सफ़ेद चीज़ें भी रंगीन दिखती थी जैसे बारिश के बाद सुनहरे मौसम में सफ़ेद रोशनी से सतरंगी धनक फूटती हो। उन आँखों को देख कर ज़ेहन में पूरे हुस्न की तस्वीर उकेरी जा सकती है...फिर मेरे जैसा मुसव्विर तो इस फ़न  में माहिर ही है।

सोचा था कुछ लिखूंगा उन आँखों पर...कोई ग़ज़ल या फिर कोई नज़्म। पर वो आँखें तो ख़ुदा की लिखी किसी शेर की रदीफ़ों की तरह थीं या फिर ख़ुदा की नज़्मों की तरह...अब ख़ुदा की नज़्मों पर कोई नज़्म लिखता है क्या ? उन आँखों ने मेरे फ़न को झुठला दिया... उन आँखों ने मेरी आँखों में झांक कर बोला कि सदाकत केवल मुझमें है.. केवल मैं हूं सच्ची...बाकी सब झूठा...तुम झूठे, तुम्हारा फ़न झूठा, तुम्हारी तालीम झूठी, ये कायनात झूठी। और उन आँखों का लहज़ा इतना जादुई था कि मुझ जैसे कुतर्की इंसान को भी उन पर यक़ीन सा होता जा रहा था...कोई सम्मोहन सा था उनमें। मैंने इरादतन अपनी नज़र को उस DP से हटाया ...अपने मां-बाप का इकलौता उपद्रवी चराग़ हूँ...कोई जादू टोना हो जाए तो? इसलिए इतनी एहतियात बरतता हूँ। हालांकि मैं मुंतज़िर हूं उन आँखों से हक़ीक़त में रूबरू होने के लिए.....

वो आँखें जो ख़ुदा के शेर की कोई रदीफ़ हैं
वो आँखें हैं या कोई चांद तारे हैं खलाओं में

नोट - मैं दो भाई हूँ...लेकिन मेरे बड़े भाई साहब बहुत शरीफ़ हैं लिहाज़ा मैं अपने घर का इकलौता उपद्रवी चराग़ हूँ।।


रदीफ़ - किसी ग़ज़ल के हर शेर के आख़िर में बार बार आने वाले शब्द
मुसव्विर - चित्रकार
मुंतज़िर - इंतज़ार करने वाला


           - सौरभ श्रीवास्तव 

Comments

Post a Comment

Popular Posts